ईरान न्यूक्लियर डील पर अमेरिका को क्यों झुका रहा है

ईरान न्यूक्लियर डील पर अमेरिका को क्यों झुका रहा है

ईरान ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह पश्चिमी देशों के दबाव में झुकने वाला नहीं है। तेहरान ने हाल ही में घोषणा की है कि जब तक अमेरिका प्रतिबंध हटाने और परमाणु समझौते पर ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक वह अपने परमाणु ठिकानों की जांच की अनुमति नहीं देगा। यह सीधा संदेश वाशिंगटन के लिए एक बड़ी चुनौती है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) लगातार ईरान के परमाणु कार्यक्रमों की निगरानी बढ़ाने की मांग कर रही है, लेकिन ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है।

यह विवाद नया नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) से बाहर कर लिया था। उसके बाद से ही ईरान ने अपनी यूरेनियम संवर्धन क्षमता को तेजी से बढ़ाया है। अब स्थिति यह है कि ईरान किसी भी समझौते से पहले अपनी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है। वह जानता है कि उसके परमाणु ठिकाने ही उसका सबसे बड़ा दांव हैं।

प्रतिबंधों को हटाए बिना जांच की कोई गुंजाइश नहीं

ईरान का रुख स्पष्ट है। ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन के प्रमुख ने साफ कहा है कि बिना प्रतिबंध हटाए कोई भी अतिरिक्त निरीक्षण संभव नहीं है। पश्चिमी देश चाहते हैं कि ईरान पहले अपने परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाए और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों को खुली छूट दे। ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है।

यह रणनीति ईरान को कूटनीतिक बढ़त देती है। तेहरान समझता है कि अगर उसने पहले ही अपने पत्ते खोल दिए, तो अमेरिका प्रतिबंध हटाने में ढिलाई बरतेगा। अतीत के अनुभवों ने ईरान को सतर्क कर दिया है। 2015 के समझौते के बाद भी ईरान को वह आर्थिक लाभ नहीं मिले जिसकी उसने उम्मीद की थी।

यूरेनियम संवर्धन और बढ़ता दबाव

मिडिल ईस्ट में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। ईरान अब 60 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धित कर रहा है, जो परमाणु हथियार बनाने के बेहद करीब है। तकनीकी रूप से देखें तो हथियार ग्रेड यूरेनियम के लिए 90 प्रतिशत शुद्धता की आवश्यकता होती है। 60 से 90 प्रतिशत तक पहुंचना ज्यादा मुश्किल नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान वास्तव में परमाणु बम नहीं बनाना चाहता, बल्कि वह अपनी सौदेबाजी की क्षमता बढ़ा रहा है। वह इस क्षमता का उपयोग अमेरिका से आर्थिक रियायतें पाने के लिए कर रहा है। प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है, और मुद्रास्फीति आसमान छू रही है।

क्षेत्रीय राजनीति और वैश्विक प्रभाव

ईरान का यह कड़ा रुख केवल अमेरिका के खिलाफ नहीं है। यह इजरायल और सऊदी अरब जैसे क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों को भी एक सीधा संदेश है। इजरायल ने कई बार चेतावनी दी है कि वह ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। वह सैन्य कार्रवाई की धमकी भी दे चुका है।

ईरान इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है। उसने अपने परमाणु ठिकानों को पहाड़ों के नीचे गहरी भूमिगत सुविधाओं में छिपा दिया है। नातंज और फोर्डो जैसी जगहों पर हमले करना किसी भी देश के लिए आसान नहीं होगा।

सुरक्षा मामलों के विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका के पास सीमित विकल्प हैं। सैन्य कार्रवाई पूरे मिडिल ईस्ट को युद्ध की आग में झोंक सकती है। तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। इसलिए कूटनीति ही एकमात्र रास्ता बचता है।

सच्चाई यह है कि अमेरिका को अपनी रणनीति बदलनी होगी। दबाव की राजनीति अब काम नहीं कर रही है। ईरान ने साबित कर दिया है कि वह प्रतिबंधों के बावजूद अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ा सकता है। यदि जो बाइडेन प्रशासन वाकई में इस संकट का समाधान चाहता है, तो उसे ईरान की आर्थिक चिंताओं को दूर करना होगा।

वैश्विक शक्तियों को यह समझना होगा कि ईरान को अलग-थलग करके कोई हल नहीं निकलने वाला। अमेरिका को कूटनीतिक लचीलापन दिखाना होगा। प्रतिबंधों में आंशिक ढील देकर बातचीत की शुरुआत की जा सकती है। इसके बिना ईरान अपने परमाणु ठिकानों के दरवाजे कभी नहीं खोलेगा। दोनों पक्षों को अपनी जिद छोड़कर एक व्यावहारिक रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए।

NB

Nathan Barnes

Nathan Barnes is known for uncovering stories others miss, combining investigative skills with a knack for accessible, compelling writing.