डोनाल्ड ट्रंप और स्पेन के रिश्तों में आई कड़वाहट का असली सच

डोनाल्ड ट्रंप और स्पेन के रिश्तों में आई कड़वाहट का असली सच

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जब कोई बड़ा देश आंखें दिखाता है, तो पूरी दुनिया की नजरें उस पर टिक जाती हैं। खासकर बात जब डोनाल्ड ट्रंप की हो, तो बयानों की गर्मी और बढ़ जाती है। सोशल मीडिया और कुछ मीडिया हलकों में इन दिनों एक बड़ी चर्चा चल रही है। दावा किया जा रहा है कि ईरान संकट के दौरान साथ न देने पर ट्रंप ने स्पेन से सारे संबंध तोड़ दिए। लोग कह रहे हैं कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि स्पेन वाले खुद दौड़ते हुए वापस आएंगे। इस बात में कितना दम है और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की असली हकीकत क्या है, इसे साफ-साफ समझना जरूरी है।

भावुक दावों और सनसनीखेज हेडलाइंस से अलग हटकर जब आप फैक्ट्स को देखते हैं, तो तस्वीर काफी अलग नजर आती है। सुपरपावर देश रातों-रात किसी पुराने सहयोगी से सारे रिश्ते नहीं खत्म करते। हां, दोनों देशों के बीच तनाव जरूर पैदा हुआ था। यह सब साल 2019 के उस घटनाक्रम से जुड़ा है जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जैसी स्थिति बन रही थी। Also making waves in related news: The Strategic Calculus of Allied Endorsement in Western Iranian Escalation.

आखिर क्या हुआ था साल 2019 में

पश्चिम एशिया में हालात बेहद नाजुक थे। अमेरिकी सरकार ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे। इसके बाद फारस की खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोतों की तैनाती की जा रही थी। इस पूरे अभियान का नेतृत्व अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन कर रहा था। इस अमेरिकी बेड़े में स्पेन का एक अत्याधुनिक नौसैनिक जहाज 'मेंडेज नुनेज' भी शामिल था। यह जहाज एक पूर्व निर्धारित सैन्य अभ्यास के तहत अमेरिकी बेड़े का हिस्सा बना था।

जैसे ही अमेरिकी बेड़े का रुख ईरान की तरफ बढ़ने लगा, स्पेन की सरकार सतर्क हो गई। स्पेन की तत्कालीन रक्षा मंत्री मार्गरीटा रोबल्स ने तुरंत एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपने युद्धपोत को अमेरिकी बेड़े से अस्थायी रूप से अलग होने का आदेश दे दिया। स्पेन का साफ कहना था कि वे अमेरिका के साथ तय सैन्य अभ्यास का हिस्सा थे, लेकिन ईरान के खिलाफ किसी भी संभावित सैन्य टकराव या एकतरफा कार्रवाई में शामिल नहीं होना चाहते। Further details regarding the matter are detailed by Al Jazeera.

ट्रंप की नाराजगी और अमेरिकी विदेश नीति का दबाव

स्पेन के इस कदम से वॉशिंगटन में खलबली मच गई। डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति हमेशा से 'अमेरिका फर्स्ट' के सिद्धांत पर काम करती है। वे अपने सहयोगियों से बिना शर्त समर्थन की उम्मीद रखते हैं। स्पेन का पीछे हटना ट्रंप प्रशासन को एक बड़े झटके की तरह लगा। इसे अमेरिकी नेतृत्व को चुनौती देने के रूप में देखा गया।

ट्रंप ने सार्वजनिक मंचों और अपनी रैलियों में कई बार नाटो सहयोगियों की आलोचना की है। उनका मानना रहा है कि यूरोपीय देश अमेरिकी सुरक्षा का फायदा उठाते हैं लेकिन वक्त आने पर जिम्मेदारी से पीछे भाग जाते हैं। स्पेन के फैसले के बाद अमेरिकी अधिकारियों ने दबे स्वर में और कई बार खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की। ट्रंप के तीखे बयानों की शैली को देखते हुए ही इस तरह की खबरें बनीं कि वे स्पेन को सबक सिखाने की बात कह रहे हैं।

संबंध तोड़ने के दावों में कितनी सच्चाई है

अब आते हैं उस सबसे बड़े सवाल पर जो हर कोई पूछ रहा है। क्या ट्रंप ने स्पेन से सारे रिश्ते तोड़ लिए थे। इसका सीधा और सपाट जवाब है नहीं। कूटनीति में 'रिश्ते तोड़ने' का मतलब बहुत बड़ा होता है। इसका अर्थ होता है दूतावासों को बंद करना, राजदूतों को वापस बुलाना और व्यापार पर पूरी तरह रोक लगा देना। अमेरिका और स्पेन के बीच ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था।

स्पेन और अमेरिका के बीच व्यापारिक, रणनीतिक और खुफिया स्तर पर सहयोग हमेशा जारी रहा। स्पेन के रोटा और मोरोन में अमेरिकी सैन्य ठिकाने आज भी मौजूद हैं और उस तनाव के दौरान भी काम कर रहे थे। ट्रंप की नाराजगी नीतियों को लेकर थी, न कि दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को खत्म करने को लेकर। उनके कड़े बयानों को अक्सर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जाता है।

नाटो सहयोगियों के साथ ट्रंप का पुराना टकराव

स्पेन अकेला ऐसा देश नहीं है जिसने ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिकी फैसलों से दूरी बनाई थी। जर्मनी और फ्रांस जैसे बड़े यूरोपीय देशों के साथ भी ट्रंप के गहरे मतभेद रहे हैं। ट्रंप लगातार शिकायत करते रहे हैं कि नाटो देश अपनी रक्षा पर तय जीडीपी का दो प्रतिशत खर्च नहीं करते। वे रक्षा का पूरा बोझ अमेरिका के सिर पर डाल देते हैं।

जब स्पेन ने ईरान मामले में अपने पैर पीछे खींचे, तो यह ट्रंप के उसी पुराने गुस्से को भड़काने जैसा था। ट्रंप का यह अंदाज रहा है कि वे सार्वजनिक रूप से सहयोगियों को डांटने या उन पर तंज कसने से गुरेज नहीं करते। 'वे दौड़ते हुए वापस आएंगे' जैसी भाषा ट्रंप की खास बातचीत की शैली का हिस्सा रही है, जिसका इस्तेमाल वे अक्सर व्यापारिक वार्ताओं या रणनीतिक समझौतों में खुद को मजबूत दिखाने के लिए करते हैं।

इस पूरे विवाद से क्या सबक मिलता है

अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं से नहीं, बल्कि देशों के अपने हितों से चलती है। स्पेन ने अपनी संप्रभुता और यूरोपीय संघ की नीतियों को ध्यान में रखकर फैसला लिया। वे ईरान परमाणु समझौते के पक्ष में थे, जिससे ट्रंप बाहर निकल चुके थे। स्पेन को डर था कि अमेरिका के साथ जाने पर वह एक ऐसे युद्ध में घसीट लिया जाएगा जिसकी उसे जरूरत नहीं थी।

दूसरी तरफ अमेरिका ने यह साफ कर दिया कि जो देश संकट के समय उसके साथ नहीं खड़े होंगे, उन्हें व्यापार और अन्य समझौतों में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। यह एक तरह का कूटनीतिक दबाव था, न कि संबंधों का अंत।

अगर आप इस तरह की अंतरराष्ट्रीय खबरों को समझना चाहते हैं, तो हमेशा आधिकारिक बयानों और रक्षा मंत्रालयों की रिपोर्ट पर भरोसा करें। सोशल मीडिया की हेडलाइंस अक्सर क्लिक्स पाने के लिए बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती हैं। किसी भी देश के साथ रिश्तों की मजबूती दशकों के समझौतों पर टिकी होती है, जो किसी एक बयान से खत्म नहीं होती।

NB

Nathan Barnes

Nathan Barnes is known for uncovering stories others miss, combining investigative skills with a knack for accessible, compelling writing.